Corruption exposed in solar net metering and smart meter schemes — officials demand bribes, citizens face pressure for solar connections.
सोलर कनेक्शन और स्मार्ट मीटर का खेल: जनता पर दबाव, अफसरों की कमाई का नया जरिया!
रिपोर्ट: सच बोलो टीम | स्थान: चंगोरेभटा ज़ोन, छत्तीसगढ़ | दिनांक: 29 अक्टूबर 2025
भारत सरकार जहां एक ओर हर घर को "ग्रीन एनर्जी" से जोड़ने की मुहिम चला रही है, वहीं दूसरी ओर राज्य स्तर पर इसका क्रियान्वयन कई सवाल खड़े कर रहा है। सोलर पैनल और स्मार्ट मीटर के नाम पर उपभोक्ताओं से वसूली, रिश्वत और दबाव की शिकायतें सामने आ रही हैं। “सच बोलो” की जांच में यह खुलासा हुआ है कि चंगोरेभटा ज़ोन समेत कई क्षेत्रों में बिजली विभाग के कर्मचारी और निजी एजेंट मिलकर नेट मीटरिंग कनेक्शन के नाम पर पैसों की अवैध मांग कर रहे हैं।
मोदी सरकार की सोलर नीति — जनता के हित या कंपनियों के लिए लाभ?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने सोलर एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू कीं। सरकार का दावा है कि आने वाले वर्षों में भारत “नेट ज़ीरो कार्बन” लक्ष्य हासिल करेगा। इसके लिए हर उपभोक्ता को सोलर पैनल और स्मार्ट मीटर से जोड़ने की बात कही गई।
लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। जनता कहती है कि यह योजना “पर्यावरण” के नाम पर उन्हें आर्थिक बोझ और भ्रष्टाचार के जाल में फंसा रही है।
राज्य सरकार की नई नीति से जनता परेशान
छत्तीसगढ़ की वर्तमान सरकार ने बिजली सब्सिडी नीति में बदलाव करते हुए पहले की 400 यूनिट फ्री बिजली योजना को घटाकर 100 यूनिट तक सीमित कर दिया है।
यानी, 101 यूनिट पार करते ही उपभोक्ता को पूरा बिल भरना होगा, जिससे आम जनता पर सीधा असर पड़ा है।
इसी बीच विभाग सोलर कनेक्शन लेने का “दबाव” भी बना रहा है। ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में बिजली कर्मचारी लोगों से कह रहे हैं कि अगर उन्होंने सोलर कनेक्शन नहीं लिया, तो भविष्य में उनका बिजली बिल “महंगा” होगा।
नेट मीटरिंग का नया जाल: स्मार्ट मीटर में ‘कमीशन’ की कहानी
हमारी टीम को प्राप्त एक ऑडियो बातचीत में बिजली विभाग के कर्मचारी “यशवंत सिन्हा” नाम से खुद को चंगोरेभटा ज़ोन का कर्मचारी बताते हैं। बातचीत में साफ सुना जा सकता है कि वे उपभोक्ता से कहते हैं—
“स्मार्ट मीटर ही नेट मीटर में कनवर्ट होता है, लेकिन काम कराने के लिए आपको फाइल में ‘एप्रोल’ देना पड़ेगा… हम और मैडम दोनों ही कराते हैं… 50-50 रहता है।”
इस बयान से यह स्पष्ट होता है कि नेट मीटरिंग की प्रक्रिया को जानबूझकर जटिल बनाया गया है, ताकि उपभोक्ता से अतिरिक्त पैसा लिया जा सके। कुछ उपभोक्ताओं ने बताया कि उनसे ₹3000 तक की ‘चाय-पानी’ राशि मांगी जा रही है — बिना रसीद, बिना किसी आधिकारिक दस्तावेज़ के।
"सरकारी काम के लिए रिश्वत जरूरी?"
स्थानीय उपभोक्ता ने “सच बोलो” को बताया—
“हमसे कहा गया कि बिना पेमेंट फाइल नहीं बढ़ेगी। बोले कि काम तो हम ही करते हैं, मीटर लगाना, नेट मीटर में कनवर्ट करना — सब हमारा जिम्मा है। अब बताइए, यह सरकारी योजना है या किसी ठेकेदार की दुकान?”
दूसरी ओर, विभाग के अधिकारी खुलकर कुछ नहीं बोल रहे। नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया कि—
“विभाग ने निजी वेंडर से करार किया है। कई बार एजेंट बिना हमारी जानकारी के उपभोक्ता से पैसा मांग लेते हैं। यह गलत है, लेकिन इसे पकड़ना मुश्किल होता है।”
ऑडियो प्रमाण (प्ले करें):
प्रेशर और पॉलिटिक्स: जनता के भरोसे पर सवाल
जहां केंद्र सरकार "स्मार्ट मीटर" को आधुनिक भारत की पहचान बताती है, वहीं राज्य सरकार इस प्रोजेक्ट को "राजस्व सुधार" का जरिया मानती है। परंतु उपभोक्ता कह रहे हैं कि स्मार्ट मीटर से बिल कम नहीं, बल्कि ज़्यादा आने लगे हैं।
ग्रामीण इलाकों में कई लोगों का कहना है कि उनके मीटर “ऑटोमैटिक रीडिंग” के नाम पर हर महीने अनुमानित बिल भेजे जा रहे हैं, जबकि बिजली का वास्तविक उपयोग बहुत कम है।
क्या स्मार्ट मीटर उपभोक्ता के लिए लाभदायक है?
तकनीकी रूप से देखा जाए तो स्मार्ट मीटर ऊर्जा खपत को डिजिटल रूप से ट्रैक करता है, जिससे बिल की पारदर्शिता बढ़ सकती है।
लेकिन जब यही प्रणाली मानव हस्तक्षेप और कमीशनखोरी के चक्र में फंस जाए, तो इसका उद्देश्य ही नष्ट हो जाता है। सोलर कनेक्शन लेने के बाद उपभोक्ता से नेट मीटरिंग की अनुमति, इंस्पेक्शन, सिंक्रोनाइज़ेशन आदि के नाम पर लगातार नए खर्चे जोड़े जा रहे हैं।
जनता का सवाल: “क्या सोलर योजना आम आदमी के लिए है या ठेकेदारों के लिए?”
चंगोरेभटा, कटनी, जबलपुर और भोपाल क्षेत्रों से मिल रही शिकायतें बताती हैं कि जनता अब सरकारी योजनाओं से भरोसा खो रही है। सोलर कनेक्शन लेने वालों को महीनों तक इंतज़ार करना पड़ता है, जबकि पैसे देने वाले उपभोक्ताओं का काम “तुरंत” हो जाता है।
“हमने तीन महीने पहले आवेदन किया था। कोई सुनवाई नहीं हुई। जब ₹3000 देने को कहा तो दो दिन में मीटर लग गया,” — एक शिकायतकर्ता ने बताया।
आवश्यक जांच की मांग
“सच बोलो” मांग करता है कि राज्य सरकार इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराए। सोलर नेट मीटरिंग और स्मार्ट मीटर इंस्टॉलेशन में शामिल निजी एजेंटों, कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका की जांच जरूरी है।
यह सिर्फ भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि ऊर्जा सुधारों में जनता के विश्वास का सवाल है।
निष्कर्ष: हरित ऊर्जा या काला कारोबार?
केंद्र की सोलर योजना का उद्देश्य था स्वच्छ ऊर्जा, स्वावलंबन और पारदर्शिता। लेकिन ज़मीनी स्तर पर यह योजना “रिश्वतखोरी और कमीशन” का नया माध्यम बनती जा रही है।
जब तक सरकारें अपने कर्मचारियों और ठेकेदारों को जवाबदेह नहीं बनाएंगी, तब तक कोई भी योजना “जनहित” में नहीं, बल्कि “जनशोषण” में बदलती रहेगी।
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