Fake IAS officer Vivek Mishra arrested in Lucknow after 6 years; accused of ₹80 crore job scam involving over 150 victims.
फर्जी IAS विवेक मिश्रा गिरफ्तार: 80 करोड़ की ठगी और 6 साल की फरारी का चौंकाने वाला अंत
रिपोर्टर: विजय सिन्हा, सच बोलो न्यूज़
लखनऊ, 17 अक्टूबर 2025: क्या आपने कभी सोचा है कि कोई व्यक्ति खुद को IAS अधिकारी बताकर पूरे देश में ठगी का जाल फैला सकता है? उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सामने आया एक ऐसा ही मामला लोगों को हैरान कर रहा है। सीआईडी लखनऊ और चिनहट पुलिस की संयुक्त टीम ने उस शातिर ठग को गिरफ्तार कर लिया है, जो पिछले छह साल से फरार था और 150 से अधिक लोगों से करीब 80 करोड़ रुपये ठग चुका था।
कौन है यह ‘फर्जी आईएएस’ विवेक मिश्रा?
गिरफ्तार आरोपी की पहचान डॉ. विवेक मिश्रा उर्फ विवेक आनंद मिश्रा के रूप में हुई है। 35 वर्षीय यह ठग झारखंड के बोकारो का निवासी है और इंजीनियरिंग की डिग्री रखने वाला बताया जा रहा है। विवेक खुद को 2014 बैच का गुजरात कैडर आईएएस अधिकारी बताता था। इतना ही नहीं, वह दावा करता था कि उसकी बहनें गुजरात में आईपीएस हैं। क्या यह सब सिर्फ एक झूठा नाटक था? पुलिस जांच यही बता रही है।
ठगी का तरीका: फर्जी लेटर, सोशल मीडिया और ‘सरकारी पहचान’ का खेल
विवेक मिश्रा ने ठगी के लिए सोशल मीडिया और व्हाट्सएप ग्रुप्स का इस्तेमाल किया। उसने खुद के नाम से फर्जी प्रोफाइल बनाईं और असली आईएएस व आईपीएस अधिकारियों की तस्वीरों का दुरुपयोग किया। वह सरकारी लेटरहेड और सील वाले फर्जी अपॉइंटमेंट लेटर जारी करता था और लोगों को IAS, IPS, DSP, PRO और गुजरात होम मिनिस्ट्री जैसी नौकरियों का झांसा देता था।
प्रत्येक उम्मीदवार से वह 2 लाख से 5 लाख रुपये तक वसूलता था। कई मामलों में, युवतियों को शादी का झांसा देकर उनके परिवारों से भी ठगी की गई। पुलिस के अनुसार, इस शातिर ने कई राज्यों में अपना नेटवर्क फैला रखा था।
क्या सुप्रीम कोर्ट के वकील भी बने शिकार?
इस ठगी का शिकार सिर्फ आम लोग ही नहीं बने, बल्कि एक सुप्रीम कोर्ट के वकील भी इस जाल में फंस गए। डॉ. आशुतोष मिश्रा नामक वकील ने बताया कि 2018 में विवेक मिश्रा से मुलाकात हुई थी। आरोपी ने उन्हें डिप्टी एसपी पद के लिए फर्जी अपॉइंटमेंट लेटर दिया और 4.5 लाख रुपये ठग लिए। जब सच्चाई सामने आई, तो उन्होंने 2019 में चिनहट थाने में एफआईआर दर्ज कराई।
यह केस बाद में इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) और फिर सीआईडी को ट्रांसफर किया गया। पुलिस सूत्रों का कहना है कि विवेक के खिलाफ देशभर से 150 से अधिक पीड़ितों ने शिकायतें दी हैं।
6 साल की फरारी कैसे खत्म हुई?
यह मामला 2019 से लंबित था और आरोपी लगातार पहचान बदल-बदल कर फरारी काट रहा था। कभी वह खुद को राजभवन में डिप्टी ऑफिसर बताता, तो कभी केंद्रीय मंत्रालय में तैनात अधिकारी। आखिरकार सीआईडी की टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर कमता बस स्टेशन के पास से उसे गिरफ्तार किया।
सीआईडी डीजी बिनोद सिंह के निर्देशन में डीआईजी अशोक शुक्ला ने पूरी कार्रवाई की निगरानी की। जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी के कई बैंक खाते और डिजिटल वॉलेट अलग-अलग नामों से चल रहे थे। पुलिस अब उसके बैंक रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा और ट्रांजैक्शन हिस्ट्री की जांच कर रही है।
लोगों के लिए सबक: लालच और शॉर्टकट से सावधान!
यह मामला एक बड़ा सबक है कि सरकारी नौकरियों के लिए कोई शॉर्टकट नहीं होता। अक्सर लोग जल्दी नौकरी पाने की चाह में ऐसे ठगों के जाल में फंस जाते हैं। पुलिस ने जनता से अपील की है कि वे किसी भी संदिग्ध व्यक्ति पर भरोसा न करें, चाहे वह खुद को कितना भी बड़ा अधिकारी बताए।
सीआईडी अधिकारियों ने कहा — “अगर कोई व्यक्ति सरकारी नौकरी दिलाने का दावा करे और बदले में पैसे मांगे, तो तुरंत नजदीकी थाने या ऑनलाइन पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें।”
क्या यह ठग अकेला था या पूरा नेटवर्क?
अब बड़ा सवाल यह है — क्या विवेक मिश्रा अकेले यह ठगी कर रहा था या उसके पीछे कोई संगठित गिरोह है? पुलिस का मानना है कि कुछ अन्य लोग भी इस नेटवर्क का हिस्सा हो सकते हैं। अन्य राज्यों से भी कई नाम सामने आने की संभावना है।
निष्कर्ष: कानून का शिकंजा और जनता की जागरूकता
फर्जी आईएएस विवेक मिश्रा की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यह साबित किया कि अपराध कितना भी शातिर क्यों न हो, कानून के हाथों से बचना नामुमकिन है। यह घटना जनता के लिए एक चेतावनी भी है — भरोसा करें, लेकिन जांच कर लें। हर वादा सच्चा नहीं होता।
— रिपोर्ट: विजय सिन्हा, सच बोलो न्यूज़