The Raja Saab review: Prabhas shines as Darling Prabhas, but weak screenplay and genre confusion turn the film into a missed opportunity.
‘द राजा साहब’ रिव्यू: फैंस के लिए ट्रीट, सिनेमा के लिए अधूरी कोशिश
क्या एडवांस बुकिंग का हाइप सिर्फ मार्केटिंग का नतीजा था?
सच बोलो न्यूज़ | एंटरटेनमेंट डेस्क
प्रभास के फैंस के लिए ‘द राजा साहब’ एक खास फिल्म है। लंबे समय बाद इस फिल्म में दर्शकों को वही “डार्लिंग प्रभास” देखने को मिलते हैं, जिसे लोग बाहुबली से पहले के दौर में जानते और पसंद करते थे। यह वह प्रभास हैं जो एनर्जेटिक हैं, प्लेफुल हैं और स्क्रीन पर पूरी ईमानदारी से खुद को झोंक देते हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ एक स्टार का कमिटमेंट किसी फिल्म को यादगार बना सकता है? या फिर सिनेमा को इससे कहीं ज़्यादा की ज़रूरत होती है?
फैन बनाम सिनेमा: यहीं से शुरू होती है बहस
अगर आप प्रभास के कट्टर फैन हैं, तो ‘द राजा साहब’ आपको निराश नहीं करेगी। फैन के नज़रिए से देखें तो यह फिल्म एक इमोशनल कनेक्ट बनाती है।
लेकिन जब इसी फिल्म को सिनेमा के लेंस से देखा जाता है, तो कई कमियां सामने आने लगती हैं। इंटेंट साफ दिखाई देता है, एंबिशन भी नज़र आता है, लेकिन स्क्रीन पर जो आउटपुट आता है, वह उस अनुभव को पूरी तरह बना नहीं पाता।
जॉनर कन्फ्यूजन बना सबसे बड़ा विलेन
‘द राजा साहब’ को हॉरर-कॉमेडी के तौर पर पेश किया गया था, लेकिन असल में यह फिल्म हॉरर + फैंटेसी + ड्रामा का मिश्रण बन जाती है।
समस्या यह नहीं कि फिल्म में कई जॉनर हैं, बल्कि दिक्कत यह है कि ये जॉनर आपस में संवाद नहीं कर पाते।
कभी फिल्म हॉरर बनना चाहती है, कभी फैंटेसी, कभी मास एंटरटेनर और कभी फैमिली ड्रामा। टोन कभी सेटल नहीं हो पाती और दर्शक कन्फ्यूज हो जाता है कि फिल्म आखिर किस दिशा में जा रही है।
स्ट्रॉन्ग कांसेप्ट, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले
फिल्म का कोर आइडिया वाकई दिलचस्प है। यह कोई रूटीन भूत-प्रेत वाली कहानी नहीं है और प्रेडिक्टेबल भी नहीं लगती।
प्री-क्लाइमेक्स से पहले के कुछ सीक्वेंस यह एहसास दिलाते हैं कि “हां, यही वह फिल्म है जो बन सकती थी।”
लेकिन समस्या यह है कि फिल्म उस कांसेप्ट को डिसिप्लिन के साथ कैरी नहीं कर पाती। जैसे ही कहानी थोड़ी पकड़ बनाती है, स्क्रीनप्ले खुद ही उसे तोड़ देता है।
एडिटिंग और पेसिंग ने बढ़ाई थकान
अगर स्क्रीनप्ले कमजोर हो, तो एडिटिंग उसे संभाल सकती है। लेकिन यहां एडिटिंग भी फिल्म की मदद नहीं कर पाती।
फिल्म की लंबाई ज्यादा महसूस होती है।
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गैर-ज़रूरी सीन
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अब्रप्ट ट्रांजिशन
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टोनल जंप्स
इन सबके कारण फिल्म देखते हुए एक थकान महसूस होती है। फिल्म बोरिंग नहीं है, लेकिन फोकस बार-बार टूटता है और दर्शक को लगातार एडजस्ट करना पड़ता है।
प्रभास: फिल्म की रीढ़
इस फिल्म का सबसे मजबूत पहलू सिर्फ और सिर्फ प्रभास हैं।
अगर इस फिल्म से प्रभास को हटा दिया जाए, तो पूरी कहानी ढह जाती है। उन्होंने फिल्म को अपने कंधों पर उठाया है और उसे पूरी तरह गिरने से बचाया है।
लंबे समय बाद प्रभास को एनर्जेटिक, नेचुरल और इन्वॉल्व्ड देखकर फैंस को राहत मिलेगी। यही वजह है कि फैंस के लिए यह फिल्म खास बन जाती है।
हॉरर और VFX: पोटेंशियल था, लेकिन पे-ऑफ नहीं
फिल्म डराना चाहती है, माहौल भी बनाती है, लेकिन बार-बार आने वाले प्रेडिक्टेबल जंप स्केयर उस इमर्शन को तोड़ देते हैं।
VFX कुछ जगह अच्छे लगते हैं, तो कुछ जगह अधूरे से महसूस होते हैं। समस्या क्वालिटी की नहीं, बल्कि कंसिस्टेंसी की है।
म्यूजिक और बीजीएम
थमन का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म को डूबने से बचाता है, लेकिन ऊपर नहीं उठाता।
अगर प्रभास फिल्म की रीढ़ हैं, तो थमन का म्यूजिक उसकी नाव है, जो उसे किनारे तक ले जाने की कोशिश करता है।
एडवांस बुकिंग का हाइप: मार्केटिंग का असर?
‘द राजा साहब’ की एडवांस बुकिंग को लेकर जो हाइप देखने को मिला, वह कंटेंट से ज़्यादा मार्केटिंग और स्टार पावर का नतीजा लगती है।
फिल्म का बज़ प्रभास के नाम और उनकी फैन फॉलोइंग के दम पर खड़ा किया गया, न कि मजबूत नैरेटिव के आधार पर।
निष्कर्ष: एक मिस्ड अपॉर्च्युनिटी
‘द राजा साहब’ एक ऐसी फिल्म है जो बेहतर हो सकती थी।
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कांसेप्ट स्ट्रॉन्ग है
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प्रभास शानदार हैं
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प्री-क्लाइमेक्स बेहतरीन है
लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, स्लोपी एडिटिंग और जॉनर कन्फ्यूजन फिल्म को अधूरा छोड़ देते हैं।
सच बोलो न्यूज़ के लिए निष्कर्ष साफ है—
👉 यह फिल्म फैंस के लिए ज़रूर देखने लायक है।
👉 लेकिन सिनेमा के तौर पर यह एक मिस्ड अपॉर्च्युनिटी बनकर रह जाती है।
और हां, डार्लिंग प्रभास के लिए इसे देखना बनता है—क्योंकि पुराने प्रभास की झलक यहां सच में महसूस होती है।